हिंदू धर्म एक प्रवाहःराजश्री

हिंदू धर्म एक प्रवाहःराजश्री

जिन संस्कृतियों के मिश्रण से किसी धर्म (रिलीजन) व समाज की रचना हुई है उसकी आंतरिक संरचना के तत्व निर्धारित किये जा सकते है उनका रेशो नही।

भारतीय समाज के निर्माण में कई तथ्यों ने महत्वपूर्ण भुमिका खेली।जिनमे से प्रमुख है­

1 भौगोलिक स्थिती अनुकुल वातावरण

2 मानव का मानसिक विकास धार्मिक स्तर, दर्शन व प्रकृति,

3 राजनैतिक स्थिती­ ऋग्वेद से महाभारतकालीन यर्जुवेदीय समाज कर्मकांड सामूहिक वितरण से शासन की ओर, आर्थिक स्थिती

4 मानव की महत्वाकांक्षा ­अश्वमेघ यज्ञ, लिंग की स्थापना, सूर्य की स्थापना

5 विदेशी आक्रमण से उत्पन्न सं्रकमणकाल व आर्थिक स्थिती

हिन्दु धर्म को सिर्फ एक रूढ़िगत परिभाषा में बांधने का अर्थ अज्ञान के सिवाय कुछ नहीं है।हिन्दु एक सीमा में बद्ध नहीं है हिन्दु समय के साथ चलने वाला संचलन है।हिन्दु का धर्म ज्ञान है।उसका ज्ञान ईश्वर के किसी एक रूप में बंदी नहीं है।सूत समयानुसार सामाजिक मूल्यों के अनुसार कहानी में परिवर्तन करते रहे। कई कहानियॉ रूढ्रिगस्त हो गई क्योकि समाज रूढिगस्त हो चुका था।समाज में स्त्री की स्थिती, जातिप्रथा का कठोर स्वरूप सतीप्रथा इसी रूढ़्रिगस्त स्वार्थ का नतीजा है।हिन्दु समाज दो स्तरों पर समझा जा सकता है एक ओर रूढियां व दूसरी ओर उपनिषद का दर्शन।रूढियां जिनके कारण धार्मिक भय के आधार पर शासन किया जा सकता है।

सूत ने महर्षि व्यास के द्वारा निर्धारित धर्म का पालन अवश्य किया कि उसने अपनी याददाश्त के सहारे इतिहास को संभालने में कोई कसर नही छोडी। यादों के सहारे चलते हुऐ सूत को समाज की मर्यादा भी समझनी थी और जिज्ञासु को समाधान भी देना था।जैसे ही धर्म में अज्ञान के, भय के आधार पर शासन या वर्ग विशेष को अपना फायदा समझ में आया कहानियां का स्वरूप ही नहीं हिन्दुधर्म का आंतरिक रूप भी बदल गया।हिन्दु समाज ने जातिप्रथा, व पुरूष प्रधान मूल्यो को प्राथमिकता दे कर उसका मूल मानवीय रूप ही नष्ट कर दिया।हिन्दू धर्म रिलिजन की केटेगरी में नही आता रिलिजन किसी एक भगवान का अंधा अनुयायी होता है। हिन्दुधर्म में कई केटेगरी मिली हुर्ह है।यहां रक्ष भी है यक्ष भी।यहां देवी भी है देवता भी।यहां यज्ञ भी है यहां आरती भी है।यह एक ऐसी विचारधारा है जो सभी को आत्मसात करती है। यहां जैन,बौद्व, साख्य दर्शन भी है जो ईश्वर के अस्तितव को चुनोती दे कर तर्क के आधार पर विश्व को जानने की सलाह देता है।यह मानना एक बडी गलती है कि जैन, बोद्व, साख्य, शैव, वैष्णव हिन्दु धर्म के आफ शूट है। वास्तव में इन सबके मिश्रण से हिन्दुधर्म बना है।धर्म अर्थात रिलिजन नही राइटियसनेस सत्यम वद धम्म चर।

हिन्दूधर्म में कुछ भी आरोपित (इंपोज) किया हुआ नहीं दिखाई देता है इसमें सबकुछ समाहित है ऐसा धर्म जो गहराई से अन्र्तमुखी है।सभी विश्वासों का आदर जिसमे है­ योनि, लिंग, योगी, स्मृति, भक्ति तंत्र मंत्र, दर्शन, द्वैत­अद्वैत अनेको मोटिफ इसमें है।गाय की पूजा होती है अहिंसा में जिसका विश्वास है।

उपनिषद कालीन संस्कृति एक बुद्धिजीवी संक्रमण काल था जहां हर कोई ब्रहम आत्मा प्र कृति पर विचार रखता था व उन्हे मनवाने का प्रयत्न करता था।भारतीयों के कभी भी भौतिक जगत के रचना के सिद्धांतों का विश्लेष्ण भौतिक सिद्धान्तों से न करके कास्मिक व आत्मिक सिद्धांतों पर करने की कोशिश की। भारतीय दर्शन की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह कई स्थानों पर स्वोन्मुखी है (spiritual individualism  and material individualism) जो एक शक्तिशाली राष्ट्र का विकास न कर सका। किसी राष्ट्र के शक्तिशाली होने में सबसे बड़ी बाधा सिर्फ स्व की उच्चतम स्थिती को पाने की भावना है।

मातृपूजा व लिंगपूजा का कल्ट प्रागैतिहासिक काल में पूरे विश्व में रहा है ।किन्तु भारत में इस कल्ट से पूरा दर्शन व दार्शनिक स्वरूप जुडा है ।सिंधु घाटी की सील में पशुपति की सील से संबधित पूरा पाशुपत दर्शन है कल्ट का दर्शन में बदलना विकास के उच्चस्तर को बतलाता है ।जिज्ञासा के कारण दर्शन का जन्म होता है ।विकास की इन सीढियों पर जाना एक जल्दबाजी की घटना नहीं हो सकती है।एक ओर वह दर्शन है जो स्व और ब्रह्म को जानने की अनथक चेष्टा में उपनिषद  की ओर ले जाता है वहीं पलायनवाद की ओर भी जाता है हिन्दुत्व में आशावाद व पलायनवाद दोनों ही है। हिंदुत्व एक सतत प्रवाह है क्योकि जीवन एक प्रवाह है।

पुराणकार ने भारत की जातियों को एक ही परिवार बताने का प्रयत्न करते हुऐ सभी का एक पिता कश्यप को बताया। सूत ने समयानुसार कहानियों में सुधार किया वह अमानवीय भी हुआ मानवीय भी। पुराणों के आधार पर जातिप्रथा को ठीक ठहराने वाले मानव हिन्दु धर्म के आंतरिक स्वरूप को समझने में भूल करते है यह धर्म मानवीय मूल्यों को शाश्वत रखना चाहता था इसी के कारण इस धर्म में शिव, विष्णु, अपने अपने चिन्हों के साथ समाहित हो गये।सूत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यह धर्म एक रूढ़ि में बंधा धर्म नहीं है इसमें समयानुकुल सुधार होते रहना चाहिये।

हम अपने पूर्वजों को आर्य की संज्ञा दे या द्रविणों की हम अपने पर गर्व नही कर रहे हैं। सिंधु के निर्माता न आर्य थे न द्रविण।ये दोनों ही संज्ञाऐ करने वाली है।ये कई लोग थे।लिंग पूजक, मातृशक्ति पूजक, सूर्य चन्द्रमा पूजक। पुरातन काल के सूत व ब्राह्मण अलग­अलग थे।कालान्तर में ब्राह्मण ही सूत का कार्य करने लगे। फलस्वरूप पुराण में धर्म को भय का शस्त्र बनाकर वर्चस्व बनाने में प्रयोग किया गया।रूढियों को पालने पोसने के लिये हर स्थल से कहानी जोड़ दी गई। दान­धर्म करने, स्वर्ग­ नर्क, आत्महत्या आदि का बोलबाला हो गया।इस स्वरूप में शू्रद को जीने व स्त्री को ज्ञान का अधिकार ही नहीं था।स्व अर्थ के लिये वर्ण भेद को पूरी तरह से स्थापित कर लिया गया है।इस स्थापना के लिये ईश्वर से अच्छा कोई माध्यम नहीं था।

भय का मनोविज्ञान विचित्र है भय ने ही मानव को सामाजिक प्राणी बनाया। जब वह संगठित हो गया तो भय के कारण आपस में ही लडने लगा।अज्ञान भी भय का जन्मदाता है। अज्ञान के कारण अज्ञात से भय के कारण जादू­टोने पूजा आदि का प्रचलन हुआ।अज्ञान व अज्ञात बलशाली के लिये अच्छे अस्त्र भी सिद्ध हुऐ।ज्ञान व कल्पना के विस्तार के साथ भय को भी कई रूप व आयाम मिलते जाते है।ज्ञान के विकास के साथसाथ मानव स्वयं को परिधि में भी संकुचित करता जाता है।ये परिधियॉ जाति, वर्ण, या मत की भिन्नता पर आधारित होती है।

सिंधु घाटी के निर्माता के प्रश्न पर उत्तर­दक्षिण पूर्व­पश्चिम भारत को अलग नहीं किया जा सकता है।वेद उपनिषद को सभी हिन्दू अपनी पवित्र धरोहर मानते है।संस्कृत को पवित्र भाषा समझते है।संस्कृत की लिपी देव नागरी है अर्थात देव व नागों का समन्वय। वर्तमान संस्कृत का रूप कब आया यह किस शताब्दी की देन है यह नहीं कहा जा सकता है किन्तु हर भारतीय उसे सभ्यता संस्कृति का अंग मानता है।भारतीय वर्तमान में जो भाषाऐं बोलते है उनके सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करके वे आपस मे लड़ सकते है किन्तु क्या कोई भी भारतीय संस्कृत को सिर्फ अपनी धरोहर बताकर पूर्व या पश्चिम, उत्तर, दक्षिण से लडाई कर सकते है।संस्कृत भी हिन्दू धर्म की ही भांति है जिसमे देव नाग व द्रविण सभी भाषाओं का समन्वय है।भारत में फैली संस्कृति के जनक हम सभी के पूर्वज थे।वे इंसान थे न कि द्रविण या आर्य। विभिन्न जातियां आपस में मिलकर नहीं रह सकती?

किसी राष्ट्र की उन्नति में श्रद्धा की उपादेयता कितनी सीमा में होना चाहिये।यह आज के भारत व विश्व के सम्मुख बड़ा प्रश्न है।मनुष्य में कितनी श्रद्धा हो, उतनी जो उसे ईश्वर के पास रखकर उसे कर्म के लिये व समाज के लिये उपयोगी बनाये या वह अंधश्रद्धा बनकर उसे अकर्मण्य बनाये व विध्ंवस की ओर ले जाये।श्रद्धा ईश्वर की भक्ति का वह उपादान है जो कई व्यक्तियों के लिये जीवन के ऐसंस का कार्य करता है।उसकी उपस्थिती प्रत्यक्षतः देखी जा सकती है हवा के चलने पर पत्तों के हिलने की भांति।गंध के दुगंर्ध होने पर हम नाक बंद करते है व सुगंधित होने पर हम उसे और अधिक महसूस करने के लिये सॉस लेना चाहते है।श्रद्धा भी धर्म की वही प्रतिक्रिया है जिसे मनुष्य का अंतःकरण ग्हण करके प्रतिक्रिया करता है।भक्ति का सर्वोच्च रूप मीरा, सूरदास, रहीम, कबीर जैसे कवियों में मिलता है।ऐसे कवि जिन्होने अपनी पूरी प्रतिभा को मानव बनने में लगा दिया।श्रद्धा के नाम पर दलित समाज के लिये उठना सीखना चाहिये न कि ईश्वर के नाम पर मरना या मारना।दलितों के उत्थान के लिये प्राण त्याग श्रद्धा है।

भारत के इतिहास में सभी जातियों की अंर्तभुक्ति से पूर्व युद्ध हुआ वह कबायली युद्ध न हो कर एक सामरिक युद्ध था।जो कि koind`ya शक्तियों के बीच हुआ था। शब्द कई बार रूढ हो जाते है कई बार भाव बदल लेते है।अर्यमा के वंशज आर्य होगे।पर इसका भाव कभी भी गोरवर्णी उच्चजाति नहीं था।ऋग्वेद में एक 1399 में कहा गया है कि काले रंग के कण्व ऋषि नृसद पुत्र कहाते है। आर्य का अर्थ यदि गोरवर्णी नीली आंखो सुनहरी बालो वाला मानव है तो वह गलत है क्योकि राम, कृष्ण द्रोपदी, कृष्णद्वैपायन सभी काले थे व आर्य कहे जाते थे।यदि आर्य शब्द का यही भाव रखना है कि आर्य एक उच्च जाति है तो इसे डिसकार्ड करना चाहिये वैसे ही जैसे हब्शी व भंगी को किया गया है।

किसी एक मनु के द्वारा मनुस्मृति में दिये नियमों की किताब के कारण युगों तक अस्पृष्यता, स्त्रीत्व का हनन व शू्रदों के साथ दुव्यवहार होता रहा। एक व्यक्तिवादी कारण के कारण क्या हम मनु के नाम पर मानव व मानवीय होने से मना करेगे? प्रगतिशीलता व दलित सेवा का अर्थ पुरातन को नकारना नहीं होना चाहिये।दलित के नाम पर वर्गभेद को बढावा देना अनुचित है। दलितों की कोई जाति नहीं होती है।अस्सितव के लिये संघर्ष करना सम्माननीय है किन्तु जब समाज ही अस्तित्व की पहचान ढूंढने में लग जाये­यह एक ऐसा संघर्ष है जिसमें अंधकार है। सृष्टि सृजन है, सृष्टि प्रकाश है।हम जब नकारने की प्रक्रिया से गुजरने लगते है हम यह नहीं है, हम वह भी नहीं है।फिर प्रारंभ होती है दूसरी अंतहीन यात्रा व प्रक्रिया हम कौन है। यही वह स्थान है जहां दर्शन स्वोन्मुखी हो जाता है।अस्तित्व बनाया जाता है उसकी पहचान ढूंढी नहीं जाती है।

विश्व की कोई भी सभ्यता व संस्कृति किसी एक रेस या जाति की देन नहीं है।कोई भी ग्रंथ कभी भी लिखा गया हो। आने वाली पीढी पुरानी पीढी से ज्ञान व संस्कृति की अगली सीढी पर होना चाहिये चाहे वह पूर्व से पश्चिम हो या पश्चिम से पूर्व की ओर।

भारत ही नहीं विश्व में भिन्न मत रखने व भाषा बोलने वाले व्यापार करते थे मिल कर रहते थे।वे सदैव युद्ध ही नहीं करते रहते थे। हम क्यो यह मानना चाहते है कि भारत सिर्फ एक ही जाति का देश था और हिन्दू वहीं है जो हिन्दू घर में पैदा हुआ है।हिन्दू और संस्कृत दोनों ही सिंधु इसलिये है क्योकि इन्होने सागर की भांति हर वर्ग व भाषा रूपी नदी को समाहित किया है।

 

 

 

ब्रह्मा  ब्रह्मांड ब्राह्मण केन्द्रित केन्द्र क्रिया ग्रहण चन्द्रमा कद्रू प्रतिक्रिया केन्द्रिय

 

 

आधा आदमी और मेरी आवाज

आधा आदमी और मेरी आवाज
राजश्री

अपनी पूरी छाया से खेलता
देख अपने समानान्तर अधूरी छाया
कौतुक से ऊपर देखकर
बच्चा हैरानी से चिल्लाया
अरे! आधा आदमी! आदमी आधा!
कांप कर मैने बच्चे को धमकाया
नही नही ऐसा नहीं कहते
सुनकर कडकती आवाज बच्चा सहमा
चुप अपनी आवाज समेटता हुआ
मेरी आवाज!
मैने हर वक्त सुनी
खो न दू कहीं अपनी आवाज,
जीवन–छंद के पूर्ण गान के लिये
हर पल हर सांस
स्वर्ण रजत पहुरूओं के साथ
चार छंदों की एक तान बुनी।

कहां थी मेरी आवाज?
आधे आदमी के बेआवाज प्रश्न
मेरी आवाज बेउत्तर मौन
कहां थी मेरी आवाज?
कभी उठकर रोटियों के सुगन्धित धुऐं में,
कभी उठकर प्यालों की खनखनाहट में,
कभी उठकर साजों की झनकार में,
कभी उठकर मुद्राओं की खनक में,
कभी उठकर चोराहे के भोपुओं में,
कभी उठकर मंत्रों इबाबतों में,
कभी उठकर बारूद के धुंऐ में,
घुटती हुई लरजती हुई
आधे आदमी की सूखी आंखों में
खोती हुई।

सरहद पार जिसे छोडा
वह भी था आधा आदमी
इस पार जो लौटा
वह भी था आधा आदमी
न आवाज न आंसू
नहीं चार छंदों का गान
रोक सके न क्यो
आदमी को आधा आदमी होते हुऐ
बना सके न क्यो
आदमी को एक पूरा आदमी?

बंधु

बंधु
कूल किनारे पर्वत पत्थर वह बहती है
क्षत विक्षत हर क्षण क्षर क्षर होती है पर
किसी तरह सागर में समाना चाहती है
क्यो है अनंत आगार जल खारा
नदी के दुख समेट उसका अंतर रोया
उपर से प्रशांत पर कभी न सो पाया
तिलतिल तपकर भी सरससंदेश लिखता है
श्यामल घटा राग मल्हार में वही सुनाती है
नदी उससे मिलने इसलिये ही दौडती है।

सागर की पीडा और हलचल समझ सके
कौन है वो हवा उसे भली भांति जानती है
सूरज, सावन रंगरेज अनूठे समय का मोल दे
रोशनी, पानी से चुनरियॉ चट्टानें रंगवाती है
हवा गुपचुप गीतों में उन्हे कहानी कहती है
हवाओं की मृदा मीत लहरिये, बांधनी में
झरोखों से झांकते गीतों को ढंक लेती है
बंधु पीडा समेट सागर सी गरिमा जो रख सके
कौन है वो वे भी उसे भली भांति जानती है

हवा सदियों से पावकमाली के स्पंन्दन सुनती है
कास सिवार औढे शिलाऐं उन्हे पर्वत को सुनाती है।

मिथ का जन्म

भारतीय संस्कृति एक प्रवाह है और जिस भाषा में प्राचीन साहित्य प्राप्त होता है वह भाषा संस्कृत भी एक प्रवाह है।महर्षि वेद व्यास ने सर्वप्रथम प्रयत्न करके इस प्राचीन साहित्य को संपादित व सुरक्षित रखने का प्रयत्न किया।
वेदों व पुराणों को समझने पर भारतीय संस्कृति व हिन्दू धर्म की संरचना को व इतिहास को समझना सहज हो सकता है।इन ग्रंथों को समझने के लिये आवश्यक है कि हम इनमें व्यक्त मिथ व प्रतीकों को समझे।
प्रस्तुत निबंध­माला इसी दिशा में किया गया एक प्रयास है।यह निबंध मेरी वर्षो से की जा रहे शोध का परिणाम है।राजकमल द्वार प्रकाशित होने वाले ऐतिहासिक उपन्यास “पशुपति” को लिखने के दौरान मैने विश्व व भारतीय प्राचीन के साहित्य को ऐनेलेटिकल दृष्टि से समझने का प्रयास किया।भारतीय साहित्य हिंदू धर्म संस्कृति में रूचि रखने वाले इन निबंधों को उपयोगी पायेंगे।

मिथ का जन्म

 

मिथ उन मूल प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश करते है, जो मानव मस्तिष्क की जरूरत है। मिथ का धार्मिक होना जरूरी नहीं है। जो भी कुछ हम जानते है वह यदि तथ्यपरक व युक्तिसंगत ज्ञान नही है तो वह मिथ है, यह एक मिथ्या धारणा है। मिथ में उपस्थित कई तथ्यों को समानता व तुलना के सिद्धांत के आधार पर समझा जा सकता है, क्योकि मिथ समानता या तुलना के आधार पर सृष्टि का आरंभ, मानव का जन्म, सृष्टि का अंत, प्रकृति के च्रक विभीषिका जैसे जटिल प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश करते है। मिथ में प्रतीकों के माध्यम से प्रकृति को समझाने का प्रयत्न किया जाता है।

आदिमानव की प्रतिक्रिया ग्रहण या सांसारिक या प्राकृतिक च्रक के प्रति भिन्न­भिन्न रूपों से होती थी जो कि तर्क पर नही भय व आस्था पर आधारित होती थी। मिथ की कहानियों से हमें कहने वाले लोगों के भौगोलिक वातावरण व उस वातावरण से उनके संबंध के बारे में भी जानकारी मिलती है।उनकी मानसिक अवस्था भी ज्ञात होती है।जैसे मिश्र में सभी देवी­देवता बड़े ही दयालु है वे मानवों के बीच घूमते है उनके दर्द समझते है।वहीं सुमेरियन देवी­देवताओं का स्वभाव उग्र है।वे मानव को एक खिलौना समझते है।मिश्र की नदी नील सुमेर की दजला­फरात से बिल्कुल अलग है।नील अपने साथ तबाही नहीं लाती है वह अपने साथ फसल के लिये मिट्टी लाती है वही सुमेर के लोगों को अन्न के लिये बहुत ही मेहनत करनी पड़ती थी।

मानव में भाषा के पूर्ण विकास से भी पूर्व प्रकृति के प्रति जिज्ञासा होगी ही। क्योंकि यह जिज्ञासा ही मानव को पशु­समाज से अलग करती है। इस जिज्ञासा के साथ मानव ने आसमान के तारे देखे, समय के साथ शिकार के स्थान पर खेती का वर्चस्व होता गया, पशु पालतू बना लिये गये।प्रकृति की विभीषिकाओं से बचाव के साधन उपलब्ध होने से जिज्ञासा को अधिक समय मिलने लगा।मानव ने समझा कि बच्चा कैसे होता है। इस प्रश्न के समझने के साथ ही उसने धरती, आसमान, चांद­सूरज, तारे आदि का जन्म कैसे हुआ होगा इसका उत्तर इसी समानता के सिद्धांत के आधार पर दिया। विश्व के अधिकांश मिथ इस प्रश्न का लगभग एक ही तरह का उत्तर देते है।स्त्री­पुरूष के मिलन की ही भांति धरती आकाश मिले और  ब्रह्मांड जन्म हुआ।

ऐतिहासिक मानव,  प्रागैतिहासिक मानव से कही अधिक जटिल प्रश्नों के उत्तर तो देते ही है, किन्तु विकास के साथ ही प्रश्नों के मौलिक उत्तर जटिल होते जाते है। उन उत्तरों में फैंटसी भी समय के साथ बढ़ती जाती है।

मिथ में संकेतात्मक प्रतीक हो सकते है, भौतिक तथ्य हो सकता है जो किसी प्राकृतिक सत्य को इंगित करता हुआ हो। मिथ से मानव को शिक्षा देने या सजा के भय द्वारा नैतिक क्रम बनाये रखने का प्रयत्न भी किया जाता था, अत मिथ किसी कहानी का रूप भी हो सकता है।मिथ में इतिहास का अपभ्रश रूप भी मौजूद हो सकता है।जैसे कार्तिकेय के जन्म संबंधी कथा में। मिथ एक ऐसी कथा हो सकती है जिसमें धार्मिक आस्था अथवा किसी धार्मिक  क्रिया ग्रहण को समझाने व स्थापित करने का प्रयत्न किया गया हो।

जितना दुरूह व विषम समाज होगा उतने ही दुरूह व विषम धर्म व सिंद्धात होगे। इसी विषमता के साथ मिथ का सीधा­सादा रूप भी परिवर्तित हो जाता है जो समानता उपमा के रूप में प्रयुक्त की गई थी वह मेटाफोर तथा प्रतीक सिम्बल  तथ्य के रूप में गहण कर ली जाती है। धर्म में अधिक आस्था को उपजाने के लिये समानता व प्रतीक एक कर दिये जाते है उन्हे किसी महान साहित्यिक गाथा का रूप दे दिया जाता है।इस प्रकार की गाथाओं में कभी­कभी पुराने मत पर नये मत को स्थापित करने का उद्देश्य होता है।इस तरह की गाथा के माध्यम से प्रचलित मत को विस्थापित करना या प्रचलित मत को नये रूप में बताया जाता है­ सिन्क्रेटिज्महृ। हिन्दु धर्म में इतिहास व मिथालाजी का मिश्रण भी ऐसा ही मिश्रण है।

यहां पर उपमा, रूपक, व प्रतीक को समझना आवश्यक है।

राजा सूर्य के समान है।उपमा

राजा सूर्य है।सूर्य राजा है।रूपक

राजा सूर्य का प्रतीक है। प्रतीक जिसे रेखाओं के द्वारा निरूपित किया जा सकता है।

लिंग पौरूष शक्ति का प्रतीक है।

शिव आदिपुरूष है।

लिंग शिव का प्रतीक है।

अमूर्त भावना को दैहिक या प्रतीक रूप भी दिया जा सकता है। जैसे समय का देवता महाकाल है। प्रतीक में कोई चीज किसी अन्य चीज को व्यक्त कर सकती है। तांत्रिक शास्त्र के तंत्र व यंत्र प्रतीक रूप है। प्रतीक एक पूर्ण विचार को व्यक्त करता है वहीं रूपक पूर्ण विचार व्यक्त करे यह आवश्यक नहीं है। प्रतीक में व्यक्त पूर्ण विचार हर व्यक्ति अलग­अलग ग्रहण कर सकता है।

अमूर्त शक्ति को दो रूप में व्यक्त किया जाता सकता है­

1 एक का विभाजन

2 एक में अनेक का विलय

जैसे एक ही मातृशक्ति अपने को कई रूपों में विभक्त करती है। उनके कार्य के अनुसार उनका नाम व प्रतीक होता है। विश्व का पालन करने वाला रूप अन्नपूर्णा, विद्या देने वाला सरस्वती, धन देने वाला लक्ष्मी, रक्षा करने वाला रूप दुर्गा आदि।

इसके विपरीत कई बार समय के अनुसार जो देवी या देवता प्रभावशाली होता है उसके साथ अनेकों का विलय होता है।जैसे शिव के साथ ग्राम रक्षक देवी­देवता, रक्षा करने वाली देवियों का विलय हो गया।सभी देवियां रक्षा करने वाली दुर्गा के विश्वव्यापी रूप में पार्वती में विलय हो कर शिव से जुड़ी है।

मानव जैसे जैसे सभ्यता से संस्कृति की ओर अग्रसर होता है उसकी जीवन के कारण, जीवन में कारण, जीवन के प्रति लक्ष्य, मृत्यु आदि सनातन प्रश्नों के प्रति जिज्ञासा बढ़ती जाती है। मानव  ब्रह्मांड के साथ स्वयं की संगति बनाने की कोशिश करता है। इस स्थिति में भारतीय मानस समय को अनंत मानता है। समय को अनंत मानना व उसके रिलेशन में ब्रह्मांड की भौतिक स्थिति का निर्धारण करना एक असंभव कार्य है। अत भारतीय मानस अनंत की खोज में घूमता है। इसी अनंत की खोज का परिणाम उपनिषद् है।

समय के साथ बढ़ती विषमता को हम तीन उदाहरणों से समझ सकते है।समय के साथ चेतन व अचेतन में दूरी तो बढ़ती ही है दोनों ही अपने­अपने स्तर पर जटिल होते जाते है।विचारों की जटिलता मिथ व स्वपनों के आधार पर समझी जा सकती है। मै तीन कहानियॉ व स्वपनों का उदाहरण दे रही हूं।

प्रथम स्थिति­ स्वपन अचेतन

कद्रू अत्यन्त गोपनीय स्वर में नोधा को अपने स्वपन के बारे में बता रही थी। उसने स्वपन में दुलर्भ पुष्पों से परिपूर्ण सरोवर देखा था। उस सरोवर के मध्य में अत्यन्त प्रकाशित एक पुष्प पर सूर्य का निवास था। पास ही में अनेक जल पक्षियों का आवास था। ये जल पक्षी नदियों से पानी का संग्रह करके प्रतिदिन सूर्य के पास ले जाते हैं। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे उसने अपने पितामह को वहॉ जल पक्षी के रूप में देखा हैं। उसके पास जल का संग्ह नहीं हैं अत सूर्य उस पर क्रोधित हैं। नोधा, ” शायद मृत्यू के बाद हम जल पक्षी बनकर जल एकत्र करेंगे।”कद्रू ने सिर हिलाया। नोधा, “क्यों न डेरे पर चल कर बरम से इस स्वपन के बारे में पूछें !”

इस स्थिति में स्वपन एक­दम सीधा सादा है जब जीवन में कुछ ही समस्याऐं है।मृत्यु के पश्चात का जीवन सूर्यलोक में बीतता है।सूर्य के कारण जल बरसता है कैसे बरसता है इसका उत्तर है हमारे पितर मर कर जल पक्षी बनते है।कबीले का पुजारी सपनों का अर्थ जानता है क्योंकि उसके पास अनेकों शक्तियां है। स्वपन में मानव दूसरी दुनिया घूम कर आया है वह यहीं समझता है।

बाबा देवल की कहानी­ मिथ

बाबा देवल गांव के बच्चों को कहानी सुना रहे थे। बाबा ने धरती आकाश का मिलनस्थल बताते हुऐ कहा, “वहीं पर कभी एक समय जब धरती आकाश दोनो मिले, तब सूर्य का जन्म हुआ। अकेला चमकता सूर्य आसमान उदास होता था। इसलिये धरती आकाश फिर मिले और चन्मा का जन्म हुआ। इन्ही सूर्य और चन्द्रमा व धरती के मिलने से हम प्राणियों का जन्म हुआ। चन्द्रमा  व धरती के मिलन से वनस्पति पैदा हुई।जल पैदा हुआ। एक समय ऐसा था हम कुछ नहीं जानते थे। गाय नील गाय जैसी जंगल में दौड़ती थी। मुर्गी कबूतर जैसी उड़ती रहती थी। आदमी सुबह शाम सूरज के साथ जीता और मरता था। उसके पास कुछ नहीं था। वह मरे जानवर की खाल पहन कर घूमता था। आसमान से पानी गिरता नदियों को भर देता। इंसान को कहीं छिपने की जगह नहीं थी। एक दिन ंऊपर से आसमान आग और पानी दोनों उगल रहा था। सारे सुमेरू कुल रोते डरते भाग रहे थे। सफेद पहाड़ों से भी पानी की धाराओं ने पूरे क्षेत्र को जलमग्न कर दिया था। भू देवी ने हमारे लिये पहाड़ों में छेद बनाये। बाबा देवल ने देवी के मंदिर की तरफ मुंह करके प्रणाम किया। सारे बच्चों ने भी प्रणाम किया। उन छेदों में रात को मानव छिपने लगा। कहते हैं, तब मानव बस हंसना और रोना ही जानता था। बच्चों ने आश्चर्यचकित पूछा, “बाबा इतना दुख था। वे बात नहीं करते थे।”

उपरोक्त उदाहरणों के आधार पर कई बाते समझी जा सकती है। इस अवस्था में बच्चे भाषा के होने के महत्व को समझ रहे है।उनके लिये भूतकाल में दुख था।वे स्वयं को पहले से अच्छी स्थिति में मान रहे है।वहीं बाबा देवल की दुनिया का केद भी पृथ्वी है।

इस कहानी में सीधे­सादे तरीके से उत्पत्ति को समझने की चेष्टा की गई है। ब्रह्मांड व प्राणियों उत्पत्ति के प्रश्न का समाधान समानता व तुलना के आधार पर किया गया है।धरती, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा  के आंतरिक संबंधों का परिणाम प्राणियों, वनस्पतियों, जल, वायु की उत्पत्ति है। एक ही परिवार में अन्र्तसंबंध जैसे भाई­बहन, पिता­पुत्री, माता­पुत्र सभ्यता के विस्तार के साथ निषेध किये गये।

भारत में पिता­पुत्री संबंध का उदाहरण पुराणों में  ba`*maa व सरस्वती का संबंध है।ऋग्वेद में भाई­बहन के संबंध का उल्लेख यम­यमी के मध्य यमी का यम को प्रणय निवेदन है। जिसे यम ने अस्वीकार किया। प्रजापति स्वायभुव मनु की पुत्री दक्षिणा ने अपने भाई यज्ञ से विवाह की इच्छा की जिसे उसके माता­पिता ने पूरा किया।विश्व की अधिकांश प्रागैतिहासिक समाजों में अंत: विवाह आम थे। विशेषकर राजकुलों में रक्त की पवित्रता व राज्य की सुरक्षा के लिये भी इस भांति के विवाह प्रचलित थे।जैन तीर्थकर ऋषभ के समय तक कहा जाता है कि पति­पत्नी युग्म के रूप में जन्म लेते थे। विवाह की प्रथा सर्वप्रथम ऋषभ ने प्रारंभ की।पति­पत्नी का युग्म रूप में जन्म लेना भाई­बहन के संबंध को ही निरूपित करता है किन्तु नग्न स्वरूप में नहीं ढंके हुऐ रूप में।

द्वितीय स्थिति­कद्रू का स्वपन अचेतन

हांफते­हांफते किसी भांति कद्रू अपने सामने दिखने वाले ऊपर की ओर जाते पथरीले रास्ते पर चढ़ती रही।रास्ता अनायास समाप्त हो गया और उसने स्वयं को एक पर्वत की ऊंची चोटी पर पाया। इस पर्वत के सामने एक और पर्वत था जिसकी उंचाई उस पर्वत से अधिक थी जिस पर वह खड़ी थी।दोनों पर्वतों के बीच मे कुछ दूरी थी। उसने जैसे ही नीचे देखा भय के मारे उसकी श्वास रूक गई।नीचे उबलते हुऐ लावे की सर्पिल नदी बह रही थी और उस लावा नदी का उद्गम स्थल वह पर्वत था जिस पर वह खडी थी।अचानक उसे लगा जैसे उस नदी मे बाढ़ आ गई है और नदी बढ़ते बढ़ते उपर आ रही हैं।उसे लगा कि वह लावा उसे भी अपने मे समेट लेगा उसे समझ में नही आ रहा था, कि वह भाग कर किस ओर जाये।गर्म­गर्म धुंआ उसे अपने अंतर तक में जाता हुआ लग रहा था।तभी उसे लगा कि दोनों पहाड़ पास आ रहे है।उसके पास कुछ ही क्षण थे, जिनमें लिये निर्णय से उसकी जीवन या मृत्यु का निर्णय होना था। वह पीछे भाग नही सकती थी।उसे सही समय पर, त्वरित गति से अपने स्थल से सामने आते पर्वत पर छलांग लगानी थी, जिससे वह सामने वाले पर्वत पर चली जाये ।सामने वाले पर्वत के इस पर्वत से जुड्रते ही खाई खत्म हो जायेगी यह वह जान गई थी।जैसे जैसे वह पर्वत पास आ रहा था उसकी रम्यता भी कद्रू को दिख रही थी।कद्रू ने स्वनियंत्रण का निर्णय ले कर श्वासों को नियंत्रित किया और जैसे ही उसे लगा कि अब सही क्षण है, इस क्षण छलांग लगाने पर वह न खाई में गिरेगी, न ही वह पर्वतों के बीच में पिस कर  चूरा  बनेगीं। उसने जीवन­मृत्यु की निर्णायक छंलाग लगा दी।

इस स्थिती में स्वपन का कांपेलिक्सिटी स्तर बढ़ गया। ज्ञान के साथ भय बढता जाता है। अभी चेतन में एक अदृश्य से भय है किन्तु अचेतन में एक अदृश्य पर विश्वास भी है। भय से लडने के लिये उसमें तर्क क्षमता पूरी तरह विद्यमान है।

बाबा देवल की कहानी मिथ

बाबा देवल ने बच्चों को पूर्व की तरफ संकेत करके बताया वहीं पर कहीं महामेरू सुमेरू स्वर्णपर्वत हैं। उसी पर्वत पर सूर्य का घर हैं। सुमेरू पर्वत पर सूर्य की माता महामाई पर्वत सुन्दरी भी रहती हैं। इसी पर्वत पर भू महामाई को अन्न प्राप्त हुआ। उस दिव्य अन्न से माई सूर्य के लिये भोजन बनाती हैं, तब ही सूर्य वृष्टि करते हैं। उस वृष्टि से पृथ्वी पर हम प्राणियों के लिये अन्न होता हैं। इस अन्न में ही सूर्य ने अपनी ऊर्जा भरी हैं। पशुओं में भी वही ऊर्जा भरी हैं। चन्द्रमा को देख कर महामाई याद रखती हैं, कि आज सूर्य के लिये कौन सा अन्न बनाना हैं ?”

किसी समय पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, तारे सभी अंतरिक्ष जल मे तैरते रहते थे। जब महामाई ने हम प्राणियों की रचना की, तब चारों ओर हिलती­डुलती धरा पर हम भी पशुओं की भांति चार पैरों पर चलते थे।हम प्राणियों के लिये महामाई ने धरा को महाकूर्म के उपर रख कर स्थिर किया।जब धरा स्थिर हो गई तो हम प्राणी दो पैरों पर चलने लगे।सभी ने पूर्व की ओर देख कर महामाई को प्रणाम किया।एक बच्चा बोला कितना दुख था जब हमारे बाबा लोग चार पैर पर चलते थे !

इस स्तर में भी मिथ पृथ्वी केन्द्रित है। किन्तु कहानी में प्रकृति की व पृथ्वी पर चल रही क्रियाओं को समझ कर उत्तर देने का प्रयत्न किया गया है।

तृतीय स्तर

कद्रू धागों को सुलझाने का प्रयास कर रही थी कि धागे उसके हाथ से छूटकर सीधी रेखाओं मे दूर तक चले गये।कुछ देर बाद उसने देखा कि सीधी रेखाऐ पलट गई।ये रेखाऐ उसके हाथ मे आ गई।उसने देखा कि सीधी रेखाऐं बढ़ते­बढ़ते गांठ में बदल गई। सीधी रेखाओं से बनी गांठ इतनी दुश्कर थी, कि वह उसे नहीं खोल पा रही थी। गांठ को न खोल पाना उसे भयभीत कर रहा था। धीरे धीरे उसे लगा वह गांठ उसे बन्दी बनाती जा रही हैं। वह सांस नहीं ले पा रही थी।उसके अस्तित्व को गांठ ने अपने में बंदी बना लिया। गांठ धीरे धीरे मकड़ी में परिवर्तित हो गई। अब मकडी के विशालकाय जाल में उसने स्वयं को बंदी पाया। उस विशाल जाल में कई लोग फंसे हुऐ थे। सभी बाहर निकलने का प्रयत्न कर रहे थे। विशाल मकड़ी पेट में से जाले को बाहर निकाल कर फैलाती व पुन निगल जाती।कद्रू उस जाल से बाहर नहीं निकल पा रही थी। जब तक वह बाहर निकलने का प्रयत्न करती, थोड़ा सा निकल पाती और मकड़ी उसे जाले के साथ पुन निगल जाती।

स्वपन का यह स्तर अत्यंत विषमता को लिये है।जब मानव के सामने प्रश्न बहुत है किन्तु उत्तर नहीं है।वहीं वह कई उत्तरों पर यकीन नहीं करना चाहता है।उसके प्रश्न­उत्तर प्रतीक रूप में उसके चेतन व अचेतन पर साम्रज्य करते है।अपने ज्ञान के कारण वह ईश्वर रूपी अदृश्य पर भी विश्वास नहीं करना चाहता किन्तु अविश्वास के कारण भय भी बढ गया। दुविधाऐं अधिक है।मानव किसे वास्तविक ज्ञान कहता है वह समझने में असमर्थ है।

बाबा देवल की कहानी

अलाव के पास बाबा देवल को बच्चे घेर कर बैठे हुऐ कहानियां सुन रहे थे। बाबा ने उन्हें चंद्रमा की तरफ जाता तारा दिखाकर कहानी सुनाई। धरती से ऊपर कई तरह के पुण्यलोक हैं। ये पुण्यलोक ही स्वर्ग हैं। इन लोको में पितृ अपने पुण्यो के अनुसार रहते हैं। वहां पर इन्हे कोई काम नहीं करना पडता हैं। वहां पर सदैव सुगंधित बयार चलती रहती हैं। वहां सूरज­चांद कुछ नहीं हैं। वहां मणियों की चट्टानें हैं। उनका रंग­बिरंगा प्रकाश फैला रहता हैं। वहां भूख­प्यास कुछ नहीं हैं। जब पितरों का पुण्य क्षय होता हैं वे पहले से नीचे के पुण्यलोक में पितृयान में बैठ कर जाते हैं।वहॉ पर चारों ओर कल्प­तरू लगे है।उन तरूओं से हर वस्तु प्राप्त हो जाती है।हमें धरा पर भूमि समतल करनी पड़ती है, फसल करने के लिये मेहनत, कपड़े बनाने के लिये मेहनत, हर काम में मेहनत! अंतरिक्ष के पुण्यलोकों में वैसे तो पितरों को कोई आवश्कता ही नही होती है किंतु यदि उन्हे कुछ चाहिये तो वे कल्प­तरू के पास जाकर मांग लेते है और क्षणभर में ही उनकी इच्छा पूर्ण हो जाती है।कहते हैं, पहले पृथ्वी पर भी कल्प­तरू थे किन्तु हम प्राणियों के लोभ के कारण महापितर ने सब सुख हमसे छीन लिये। उनका क्रोध बहुत भीषण है। सबने आकाश को देखकर महापितर को प्रणाम करके उनसे क्रोध न करने की प्रार्थना की।एक बच्चा बोला, “बाबा पृथ्वी पर दुख ही दुख है।”

अब  मिथ धरा पर आधारित न हो कर स्वर्ग पर आधारित हो गये। यह मातृकेन्दित सत्ता से पितृकेन्द्रित सत्ता का प्रारंभ था।पौरूष शक्ति का वर्चस्व व उपयोग स्थापित हो  च्का था। नवपत्थर युग­ निओलिथिकहृसे धातु युग का प्रारंभ होने के साथ छोटे­छोटे समूहों से गांव, गांव से शहर, शहर से सा्रमाज्य की ओर बढता  मानव मां पृथ्वी या महामाई से दूर होता गया।उसके मन में अपनी भुमि के प्रति श्रद्धा व महामाई के प्रति कृतज्ञता का भाव समाप्त हो गया।वह महामाई की दया का प्रसाद भूल गया। अब सब­कुछ आकाश केन्द्रित हो गया। क्योकि मानव को पृथ्वी पर कोई सुख नहीं दिखाई देता।उसका ईश्वर ऊपर रहता है अत स्वर्ग ऊपर ही है।वहां कोई काम नहीं करना पडता व पृथ्वी पर जीवन के लिये संघर्ष ही संघर्ष है।

लोकमानस में चलने वाली लोककथाओं, प्रश्नों व विचारों की विषमता का यही स्तर हम ब्ह्माण व  पुराण ग्रंथों  में देखते है। इनमें किसी एक केन्द्रिय पुरूष को आधार बनाकर प्रश्नों के उत्तर रूपक, समानता आदि के द्वारा उत्तर दिये गये है।प्रतीकों के माध्यम से नीति­निर्धारण का प्रयत्न किया गया है।पुराणों में रोमांचक कल्पना अधिक है।अलाव के पास बैठ कर कहानी सुनाते बाबा देवल का स्थान सूत ने लिया जो बाबा देवल से ज्यादा बौद्धिक, तार्किक व काल्पनिक थे।जब सूत से कहानी का सिरा  ब्राह्मणों व  पुरोहितों ने ले लिया तब मिथ व धर्म एक हो गये। इस रूप में धर्म व धार्मिक आस्थाओं को बनाये रखना तथा उनके द्वारा भय पैदा करना अधिक आसान है।

सूत की कथाओं में ­

जिस पुरूष ने सृष्टि की उस पुरूष का जन्म स्थान जल है। जल का दूसरा नाम नीर है जिसने नीर से सृष्टि की वह नारायण है। कुछ कथाओं के अनुसार जल में जो विशाल अण्ड उत्पन्न हुआ उससे ब्रह्मा  का जन्म हुआ। ब्रह्मा  ने अण्डे के दो टुकडों से भूलोक व द्युलोक बनाया।

उपनिषद प्रभावित पुराणों में प्रकृति के चौबीस तत्व व तीन गुण मिलने पर सृष्टि का प्रारंभ कहा गया।उन्नति के साथ पदार्थ व तत्व की उत्पत्ति से लेकर, तत्व की सूक्ष्मता को समझने का प्रयत्न प्रारंभ हुआ।

ब्राह्मण कथाओं में यज्ञ को प्रजापति व विष्णु कहा गया है।संवत्सर या कालच्रक व प्रजापति पर्यायवाची हो गये है। पुरूष यज्ञ का स्वरूप हो गया। कभी अग्नि को ही संवत्सर का नाम दिया गया है।प्राणियों की उत्पत्ति कभी प्रजापति के श्वास से, कभी उनके तप से हुई है।कभी एक स्वर्णमय अण्डा फूट कर दो भागों में विभक्त होकर धरती आकाश बना।जितनी भी वस्तुऐं है सभी स्वर्ण अंडे से उत्पन्न मानी गई।

मिथ में कल्पना व रोमांच का स्तर इस तरह बढा कि स्वर्ग सर्वोपरी व भुमि पर जीवन नगण्य, व्यर्थ, पूर्व जन्मों के कर्मों का फल, माया का च्रक, हो गया।समय के साथ ये कथाऐं और अधिक कल्पनाप्रधान व जटिल हो गई।मानव पृथ्वी से बाहर ब्रह्मांड के बारे में सोचने लगा। मानव की जिज्ञासा के बढते आयाम का ही परिणाम मिथ, दर्शन व विज्ञान है।