हिंदू धर्म एक प्रवाहःराजश्री

हिंदू धर्म एक प्रवाहःराजश्री

जिन संस्कृतियों के मिश्रण से किसी धर्म (रिलीजन) व समाज की रचना हुई है उसकी आंतरिक संरचना के तत्व निर्धारित किये जा सकते है उनका रेशो नही।

भारतीय समाज के निर्माण में कई तथ्यों ने महत्वपूर्ण भुमिका खेली।जिनमे से प्रमुख है­

1 भौगोलिक स्थिती अनुकुल वातावरण

2 मानव का मानसिक विकास धार्मिक स्तर, दर्शन व प्रकृति,

3 राजनैतिक स्थिती­ ऋग्वेद से महाभारतकालीन यर्जुवेदीय समाज कर्मकांड सामूहिक वितरण से शासन की ओर, आर्थिक स्थिती

4 मानव की महत्वाकांक्षा ­अश्वमेघ यज्ञ, लिंग की स्थापना, सूर्य की स्थापना

5 विदेशी आक्रमण से उत्पन्न सं्रकमणकाल व आर्थिक स्थिती

हिन्दु धर्म को सिर्फ एक रूढ़िगत परिभाषा में बांधने का अर्थ अज्ञान के सिवाय कुछ नहीं है।हिन्दु एक सीमा में बद्ध नहीं है हिन्दु समय के साथ चलने वाला संचलन है।हिन्दु का धर्म ज्ञान है।उसका ज्ञान ईश्वर के किसी एक रूप में बंदी नहीं है।सूत समयानुसार सामाजिक मूल्यों के अनुसार कहानी में परिवर्तन करते रहे। कई कहानियॉ रूढ्रिगस्त हो गई क्योकि समाज रूढिगस्त हो चुका था।समाज में स्त्री की स्थिती, जातिप्रथा का कठोर स्वरूप सतीप्रथा इसी रूढ़्रिगस्त स्वार्थ का नतीजा है।हिन्दु समाज दो स्तरों पर समझा जा सकता है एक ओर रूढियां व दूसरी ओर उपनिषद का दर्शन।रूढियां जिनके कारण धार्मिक भय के आधार पर शासन किया जा सकता है।

सूत ने महर्षि व्यास के द्वारा निर्धारित धर्म का पालन अवश्य किया कि उसने अपनी याददाश्त के सहारे इतिहास को संभालने में कोई कसर नही छोडी। यादों के सहारे चलते हुऐ सूत को समाज की मर्यादा भी समझनी थी और जिज्ञासु को समाधान भी देना था।जैसे ही धर्म में अज्ञान के, भय के आधार पर शासन या वर्ग विशेष को अपना फायदा समझ में आया कहानियां का स्वरूप ही नहीं हिन्दुधर्म का आंतरिक रूप भी बदल गया।हिन्दु समाज ने जातिप्रथा, व पुरूष प्रधान मूल्यो को प्राथमिकता दे कर उसका मूल मानवीय रूप ही नष्ट कर दिया।हिन्दू धर्म रिलिजन की केटेगरी में नही आता रिलिजन किसी एक भगवान का अंधा अनुयायी होता है। हिन्दुधर्म में कई केटेगरी मिली हुर्ह है।यहां रक्ष भी है यक्ष भी।यहां देवी भी है देवता भी।यहां यज्ञ भी है यहां आरती भी है।यह एक ऐसी विचारधारा है जो सभी को आत्मसात करती है। यहां जैन,बौद्व, साख्य दर्शन भी है जो ईश्वर के अस्तितव को चुनोती दे कर तर्क के आधार पर विश्व को जानने की सलाह देता है।यह मानना एक बडी गलती है कि जैन, बोद्व, साख्य, शैव, वैष्णव हिन्दु धर्म के आफ शूट है। वास्तव में इन सबके मिश्रण से हिन्दुधर्म बना है।धर्म अर्थात रिलिजन नही राइटियसनेस सत्यम वद धम्म चर।

हिन्दूधर्म में कुछ भी आरोपित (इंपोज) किया हुआ नहीं दिखाई देता है इसमें सबकुछ समाहित है ऐसा धर्म जो गहराई से अन्र्तमुखी है।सभी विश्वासों का आदर जिसमे है­ योनि, लिंग, योगी, स्मृति, भक्ति तंत्र मंत्र, दर्शन, द्वैत­अद्वैत अनेको मोटिफ इसमें है।गाय की पूजा होती है अहिंसा में जिसका विश्वास है।

उपनिषद कालीन संस्कृति एक बुद्धिजीवी संक्रमण काल था जहां हर कोई ब्रहम आत्मा प्र कृति पर विचार रखता था व उन्हे मनवाने का प्रयत्न करता था।भारतीयों के कभी भी भौतिक जगत के रचना के सिद्धांतों का विश्लेष्ण भौतिक सिद्धान्तों से न करके कास्मिक व आत्मिक सिद्धांतों पर करने की कोशिश की। भारतीय दर्शन की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह कई स्थानों पर स्वोन्मुखी है (spiritual individualism  and material individualism) जो एक शक्तिशाली राष्ट्र का विकास न कर सका। किसी राष्ट्र के शक्तिशाली होने में सबसे बड़ी बाधा सिर्फ स्व की उच्चतम स्थिती को पाने की भावना है।

मातृपूजा व लिंगपूजा का कल्ट प्रागैतिहासिक काल में पूरे विश्व में रहा है ।किन्तु भारत में इस कल्ट से पूरा दर्शन व दार्शनिक स्वरूप जुडा है ।सिंधु घाटी की सील में पशुपति की सील से संबधित पूरा पाशुपत दर्शन है कल्ट का दर्शन में बदलना विकास के उच्चस्तर को बतलाता है ।जिज्ञासा के कारण दर्शन का जन्म होता है ।विकास की इन सीढियों पर जाना एक जल्दबाजी की घटना नहीं हो सकती है।एक ओर वह दर्शन है जो स्व और ब्रह्म को जानने की अनथक चेष्टा में उपनिषद  की ओर ले जाता है वहीं पलायनवाद की ओर भी जाता है हिन्दुत्व में आशावाद व पलायनवाद दोनों ही है। हिंदुत्व एक सतत प्रवाह है क्योकि जीवन एक प्रवाह है।

पुराणकार ने भारत की जातियों को एक ही परिवार बताने का प्रयत्न करते हुऐ सभी का एक पिता कश्यप को बताया। सूत ने समयानुसार कहानियों में सुधार किया वह अमानवीय भी हुआ मानवीय भी। पुराणों के आधार पर जातिप्रथा को ठीक ठहराने वाले मानव हिन्दु धर्म के आंतरिक स्वरूप को समझने में भूल करते है यह धर्म मानवीय मूल्यों को शाश्वत रखना चाहता था इसी के कारण इस धर्म में शिव, विष्णु, अपने अपने चिन्हों के साथ समाहित हो गये।सूत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यह धर्म एक रूढ़ि में बंधा धर्म नहीं है इसमें समयानुकुल सुधार होते रहना चाहिये।

हम अपने पूर्वजों को आर्य की संज्ञा दे या द्रविणों की हम अपने पर गर्व नही कर रहे हैं। सिंधु के निर्माता न आर्य थे न द्रविण।ये दोनों ही संज्ञाऐ करने वाली है।ये कई लोग थे।लिंग पूजक, मातृशक्ति पूजक, सूर्य चन्द्रमा पूजक। पुरातन काल के सूत व ब्राह्मण अलग­अलग थे।कालान्तर में ब्राह्मण ही सूत का कार्य करने लगे। फलस्वरूप पुराण में धर्म को भय का शस्त्र बनाकर वर्चस्व बनाने में प्रयोग किया गया।रूढियों को पालने पोसने के लिये हर स्थल से कहानी जोड़ दी गई। दान­धर्म करने, स्वर्ग­ नर्क, आत्महत्या आदि का बोलबाला हो गया।इस स्वरूप में शू्रद को जीने व स्त्री को ज्ञान का अधिकार ही नहीं था।स्व अर्थ के लिये वर्ण भेद को पूरी तरह से स्थापित कर लिया गया है।इस स्थापना के लिये ईश्वर से अच्छा कोई माध्यम नहीं था।

भय का मनोविज्ञान विचित्र है भय ने ही मानव को सामाजिक प्राणी बनाया। जब वह संगठित हो गया तो भय के कारण आपस में ही लडने लगा।अज्ञान भी भय का जन्मदाता है। अज्ञान के कारण अज्ञात से भय के कारण जादू­टोने पूजा आदि का प्रचलन हुआ।अज्ञान व अज्ञात बलशाली के लिये अच्छे अस्त्र भी सिद्ध हुऐ।ज्ञान व कल्पना के विस्तार के साथ भय को भी कई रूप व आयाम मिलते जाते है।ज्ञान के विकास के साथसाथ मानव स्वयं को परिधि में भी संकुचित करता जाता है।ये परिधियॉ जाति, वर्ण, या मत की भिन्नता पर आधारित होती है।

सिंधु घाटी के निर्माता के प्रश्न पर उत्तर­दक्षिण पूर्व­पश्चिम भारत को अलग नहीं किया जा सकता है।वेद उपनिषद को सभी हिन्दू अपनी पवित्र धरोहर मानते है।संस्कृत को पवित्र भाषा समझते है।संस्कृत की लिपी देव नागरी है अर्थात देव व नागों का समन्वय। वर्तमान संस्कृत का रूप कब आया यह किस शताब्दी की देन है यह नहीं कहा जा सकता है किन्तु हर भारतीय उसे सभ्यता संस्कृति का अंग मानता है।भारतीय वर्तमान में जो भाषाऐं बोलते है उनके सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करके वे आपस मे लड़ सकते है किन्तु क्या कोई भी भारतीय संस्कृत को सिर्फ अपनी धरोहर बताकर पूर्व या पश्चिम, उत्तर, दक्षिण से लडाई कर सकते है।संस्कृत भी हिन्दू धर्म की ही भांति है जिसमे देव नाग व द्रविण सभी भाषाओं का समन्वय है।भारत में फैली संस्कृति के जनक हम सभी के पूर्वज थे।वे इंसान थे न कि द्रविण या आर्य। विभिन्न जातियां आपस में मिलकर नहीं रह सकती?

किसी राष्ट्र की उन्नति में श्रद्धा की उपादेयता कितनी सीमा में होना चाहिये।यह आज के भारत व विश्व के सम्मुख बड़ा प्रश्न है।मनुष्य में कितनी श्रद्धा हो, उतनी जो उसे ईश्वर के पास रखकर उसे कर्म के लिये व समाज के लिये उपयोगी बनाये या वह अंधश्रद्धा बनकर उसे अकर्मण्य बनाये व विध्ंवस की ओर ले जाये।श्रद्धा ईश्वर की भक्ति का वह उपादान है जो कई व्यक्तियों के लिये जीवन के ऐसंस का कार्य करता है।उसकी उपस्थिती प्रत्यक्षतः देखी जा सकती है हवा के चलने पर पत्तों के हिलने की भांति।गंध के दुगंर्ध होने पर हम नाक बंद करते है व सुगंधित होने पर हम उसे और अधिक महसूस करने के लिये सॉस लेना चाहते है।श्रद्धा भी धर्म की वही प्रतिक्रिया है जिसे मनुष्य का अंतःकरण ग्हण करके प्रतिक्रिया करता है।भक्ति का सर्वोच्च रूप मीरा, सूरदास, रहीम, कबीर जैसे कवियों में मिलता है।ऐसे कवि जिन्होने अपनी पूरी प्रतिभा को मानव बनने में लगा दिया।श्रद्धा के नाम पर दलित समाज के लिये उठना सीखना चाहिये न कि ईश्वर के नाम पर मरना या मारना।दलितों के उत्थान के लिये प्राण त्याग श्रद्धा है।

भारत के इतिहास में सभी जातियों की अंर्तभुक्ति से पूर्व युद्ध हुआ वह कबायली युद्ध न हो कर एक सामरिक युद्ध था।जो कि koind`ya शक्तियों के बीच हुआ था। शब्द कई बार रूढ हो जाते है कई बार भाव बदल लेते है।अर्यमा के वंशज आर्य होगे।पर इसका भाव कभी भी गोरवर्णी उच्चजाति नहीं था।ऋग्वेद में एक 1399 में कहा गया है कि काले रंग के कण्व ऋषि नृसद पुत्र कहाते है। आर्य का अर्थ यदि गोरवर्णी नीली आंखो सुनहरी बालो वाला मानव है तो वह गलत है क्योकि राम, कृष्ण द्रोपदी, कृष्णद्वैपायन सभी काले थे व आर्य कहे जाते थे।यदि आर्य शब्द का यही भाव रखना है कि आर्य एक उच्च जाति है तो इसे डिसकार्ड करना चाहिये वैसे ही जैसे हब्शी व भंगी को किया गया है।

किसी एक मनु के द्वारा मनुस्मृति में दिये नियमों की किताब के कारण युगों तक अस्पृष्यता, स्त्रीत्व का हनन व शू्रदों के साथ दुव्यवहार होता रहा। एक व्यक्तिवादी कारण के कारण क्या हम मनु के नाम पर मानव व मानवीय होने से मना करेगे? प्रगतिशीलता व दलित सेवा का अर्थ पुरातन को नकारना नहीं होना चाहिये।दलित के नाम पर वर्गभेद को बढावा देना अनुचित है। दलितों की कोई जाति नहीं होती है।अस्सितव के लिये संघर्ष करना सम्माननीय है किन्तु जब समाज ही अस्तित्व की पहचान ढूंढने में लग जाये­यह एक ऐसा संघर्ष है जिसमें अंधकार है। सृष्टि सृजन है, सृष्टि प्रकाश है।हम जब नकारने की प्रक्रिया से गुजरने लगते है हम यह नहीं है, हम वह भी नहीं है।फिर प्रारंभ होती है दूसरी अंतहीन यात्रा व प्रक्रिया हम कौन है। यही वह स्थान है जहां दर्शन स्वोन्मुखी हो जाता है।अस्तित्व बनाया जाता है उसकी पहचान ढूंढी नहीं जाती है।

विश्व की कोई भी सभ्यता व संस्कृति किसी एक रेस या जाति की देन नहीं है।कोई भी ग्रंथ कभी भी लिखा गया हो। आने वाली पीढी पुरानी पीढी से ज्ञान व संस्कृति की अगली सीढी पर होना चाहिये चाहे वह पूर्व से पश्चिम हो या पश्चिम से पूर्व की ओर।

भारत ही नहीं विश्व में भिन्न मत रखने व भाषा बोलने वाले व्यापार करते थे मिल कर रहते थे।वे सदैव युद्ध ही नहीं करते रहते थे। हम क्यो यह मानना चाहते है कि भारत सिर्फ एक ही जाति का देश था और हिन्दू वहीं है जो हिन्दू घर में पैदा हुआ है।हिन्दू और संस्कृत दोनों ही सिंधु इसलिये है क्योकि इन्होने सागर की भांति हर वर्ग व भाषा रूपी नदी को समाहित किया है।

 

 

 

ब्रह्मा  ब्रह्मांड ब्राह्मण केन्द्रित केन्द्र क्रिया ग्रहण चन्द्रमा कद्रू प्रतिक्रिया केन्द्रिय

 

 

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